डाकू बन गया एक अच्छे घर का युवक !
चंबल के बीहड़ों में बंदूक थामे घूम रहा !
चंबल के बीहड़ों का इतिहास बंदूक की गोलियों और डकैतों की कहानियों से भरा पड़ा है.
इन्हीं कहानियों में से एक बेहद अनोखी और दिलचस्प कहानी है -श्याम जाटव की.
श्याम जाटव का जन्म दिल्ली के एक संभ्रांत बिजनेसमैन परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके में रहते थे। उनका बचपन आम बच्चों की तरह ही बीत रहा था.
लेकिन एक काली तारीख ने उनकी किस्मत हमेशा के लिए बदल दी। 14 मार्च 1996 को, जब श्याम की उम्र महज़ 9 वर्ष थी, चंबल के कुख्यात डकैत निर्भय सिंह गुर्जर के गिरोह ने फिरौती के लिए उनका अपहरण कर लिया।
अपहरण के बाद श्याम के बिजनेसमैन पिता डकैतों द्वारा मांगी गई भारी-भरकम फिरौती की रकम नहीं चुका पाए। नतीजा यह हुआ कि मासूम श्याम को बीहड़ों में ही रहना पड़ा। समय बीतने के साथ बीहड़ के हिंसक माहौल ने श्याम को पूरी तरह बदल दिया। निर्भय गुर्जर श्याम की निडरता से इतना प्रभावित हुआ कि उसने श्याम को गोद ले लिया और उसे अपने सबसे भरोसेमंद सिपहसालारों में शामिल कर लिया।
चंबल में रहने के दौरान ही गिरोह ने 'सरला जाटव' नाम की एक लड़की का भी अपहरण किया था। बीहड़ के साए में श्याम और सरला एक-दूसरे के करीब आए। इसके बाद गैंग लीडर निर्भय गुर्जर ने बीहड़ के जंगलों के भीतर ही हिंदू रीति-रिवाज से श्याम जाटव और दस्यु सुंदरी सरला जाटव की शादी करवा दी।
(2004-2005)समय बदला और निर्भय गुर्जर की पत्नी नीलम गुप्ता के साथ श्याम जाटव के प्रेम संबंधों की अफवाहों के कारण गिरोह के भीतर भारी फूट पड़ गई। जब गिरोह बिखरने लगा और पुलिस का दबाव बढ़ने लगा, तो श्याम जाटव ने अपराध का रास्ता छोड़ने का फैसला किया।
साल 2004-2005 के दौरान उन्होंने राजस्थान के अलवर में पुलिस के सामने पूरी तरह आत्मसमर्पण (Surrender) कर दिया।
अदालती लड़ाई और जेल के 14 साल के बाद श्याम जाटव पर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों (औरैया, इटावा, कानपुर, उरई और भिंड) में हत्या, लूट और अपहरण के लगभग 36 संगीन आपराधिक मामले दर्ज किए गए। उनके असली माता-पिता ने दिल्ली से आकर सालों तक कोर्ट में उनकी कानूनी पैरवी की। अपनी सजा के दौरान श्याम ने लगभग 14 साल जेल की सलाखों के पीछे काटे।
श्याम जाटव के जीवन में न्याय का सूरज मई 2018 में उगा, जब अदालत ने उन्हें उनके अंतिम बचे हत्या के मामले में भी सबूतों के अभाव में दोषमुक्त (बरी) कर दिया।
इस तरह वे अपने सभी 36 मामलों से कानूनी रूप से पूरी तरह आज़ाद हो गए। उनकी पत्नी सरला जाटव भी करीब 17 साल जेल में बिताने के बाद सितंबर 2022 में रिहा हो गईं।
बाहर आने के बाद श्याम जाटव ने मीडिया को दिए इंटरव्यू में खुलकर अपना दर्द साझा किया। उन्होंने कहा कि उन्हें डकैत बनने का आज भी बेहद पछतावा है। उनका मानना है कि अगर बचपन में उनका अपहरण न हुआ होता, तो वे आज पढ़-लिखकर अपने परिवार के साथ एक बड़े सरकारी अधिकारी होते।
आज श्याम जाटव अपराध की दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह कर उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में अपने माता-पिता और परिवार के साथ एक बेहद शांत, सामान्य और गुमनामी का जीवन बिता रहा है। उसकी यह कहानी साबित करती है कि समय और परिस्थितियां किसी भी इंसान को बदल सकती हैं, लेकिन सुधार का रास्ता हमेशा खुला रहता है।
- अरुण खामख्वाह
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