डॉन ऑफ़ डॉलीगंज
गैंगवार में गिर रही थी लाशें !
यूपी की राजधानी लखनऊ तहजीब और तमीज का शहर माना जाता है...लेकिन क्या आपको पता है सत्तर के दशक में देश के सबसे बड़े राज्य की राजधानी भी गोलियों की गड़गड़ाहट से गूंजती थी...यहां दो ब्राह्मण बाहुबलियों के बीच आए दिन गोलियां चलती। इस गैंगवॉर को पुलिस भी नहीं रोक पा रही थी। लेकिन एक मां ने रोक दिय।
जिस गैंगवॉर को पुलिस न रोक पाई, उसे एक मां ने कैसे रोका, इस पर आगे बात करेंगे पहले चर्चा करते हैं 70-80 के दशक के गैंगवॉर की...
ये गैंगवॉर डालीगंज इलाके में राम गोपाल मिश्रा और अरुण शंकर शुक्लाप उर्फ अन्नार के बीच था। दोनों की खूनी रंजिश ने इतना भयंकर रूप ले लिया था कि पूरा शहर त्रस्त हो गया था।
कहते हैं न कि जब दोस्ती दुश्मनी में बदलती है तो बहुत खतरनाक हो जाती है। डालीगंज के डॉन राम गोपाल मिश्रा और अरुण शंकर शुक्ला उर्फ अन्ना की कहानी ऐसी ही है।
सीतापुर के कमलापुर में एक डॉन थे बच्चू लाल दीक्षित उर्फ बच्चू महाराज। फरवरी, 1966 में उनकी हत्या हो गई। उनकी सल्तनत को शागिर्द रहे रूढ़ा, कमलापुर निवासी राम गोपाल मिश्रा ने संभाला। भाई मन्नर उर्फ राधेश्याम मिश्रा और बहनोई रामानंद बाजपेयी की मदद से राम गोपाल का रुतबा बढ़ने लगा। देखते-ही-देखते लखनऊ के साथ सीतापुर और उन्नाव तक राम गोपाल की तूती बोलने लगी। राम गोपाल का लखनऊ में एक और साथी था प्रेम शंकर शुक्ला।
प्रेम के पास नए अपराधियों की फौज थी। राम गोपाल और अन्ना शुक्ला के बीच गहरा याराना था। लेकिन एक घटना के बाद दोस्ती में दरार पड़ गई।
हुआ यह कि राम गोपाल की बेटी की शादी थी। इसमें डालीगंज के व्यापारी ज्वाला प्रसाद ने एक बाइक और बीस हजार रुपये दिए। कुछ दिनों बाद प्रेम की बहन की शादी पड़ी। प्रेम चाहता था कि उसकी बहन की शादी में भी ज्वाला मदद करे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पता चला कि राम गोपाल के मना करने पर ही ज्वाला ने हाथ खींचे थे। इसे लेकर दोनों में शुरू हुआ मतभेद इतना बढ़ा कि प्रेम ने अपना अलग गैंग खड़ा कर लिया।
धीरे-धीरे दुश्मनी बढ़ती गई और दोनों के गैंगों में मारपीट और गोलीबारी शुरू हो गई। राम गोपाल से अलग होकर प्रेम तेजी से हाथ-पांव फैलाने लगा।
1976 में प्रेम पर जानलेवा हमला हुआ। इस मामले में राम गोपाल, उसके भाई और बहनोई नामजद हुए। इसके बाद डालीगंज क्रॉसिंग पर राम गोपाल की गाड़ी पर फायरिंग की गई। प्रेम के दो छोटे भाई थे कैलाश शंकर शुक्ला उर्फ छोटे महाराज और अरुण शंकर शुक्ला उर्फ अन्ना महाराज। रेलवे क्रॉसिंग पर हुए हमले के बाद राम गोपाल ने प्रेम को ठिकाने लगाने की ठान ली।
उधर, प्रेम भी चौकन्ना था...1977 में गर्मी के दिन राम गोपाल को सुराग मिला कि प्रेम अपने भाई अन्ना और साले दिनेश के साथ पैतृक गांव लल्लापुर में पड़ोसी की छत पर सो रहा है। इसी दौरान तीनों पर हमला हुआ। फायरिंग में प्रेमशंकर और दिनेश मौके पर ही मारे गए, जबकि अन्ना भी घायल हो गया।
अन्ना ने मुलायम से मिलाए हाथ
भाई की हत्या के बाद गैंग की कमान अन्ना ने गैंग की कमान संभाल ली। प्रेम की हत्या का बदला लेने के लिए अन्ना ने साथियों की मदद से राम गोपाल के बहनोई रामानंद को डालीगंज में सरेआम गोलियों से भून डाला। इससे अन्ना का आतंक और बढ़ गया। जरायम की दुनिया में अन्ना अब अन्ना 'महाराज' कहलाने लगा। अन्ना ने डालीगंज और सीतापुर रोड गल्ला मंडी से वसूली के साथ सरकारी ठेकेदारी में भी दखल शुरू कर दिया। अन्ना ने इसी दौरान मुलायम सिंह यादव से करीबी बनाई। साथियों के साथ मुलायम के चुनाव प्रचार में भी जाने लगा। एक बार प्रचार के दौरान अन्ना ने मुलायम सिंह के विरोधियों पर फायरिंग कर दी। इसके बाद वो मुलायम के करीबियों में शुमार होने लगा। 1989 में मुलायम के सीएम बनने पर अन्ना को लोग 'डिप्टी सीएम' कहने लगे। अन्ना सपा से एमएलसी बना और उन्नाव से लोकसभा का चुनाव में उतरा।
राम गोपाल गया कांग्रेस के साथ
राम गोपाल के पास उस दौर में टॉप शूटरों की फौज हुआ करती थी। इनमें निजामुद्दीन उर्फ राजू घोसी, शंकर डे, सुरेश जायसवाल और शारिफ ऐसे थे, जो पुलिस पर भी गोली चलाने में नहीं चूकते थे। अन्ना से जुड़े लड़के से लड़ाई के बाद लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ने आए ओम प्रकाश श्रीवास्तव बबलू ने अपराध का ककहरा राम गोपाल की शागिर्दी में ही सीखाम राम गोपाल को सीतापुर के एक बड़े कांग्रेसी नेता, तत्कालीन गृह राज्य मंत्री पद्मसेठ (रमेश चंद्र सेठ) लखनऊ के एक ट्रांसपोर्टर गुरु बख्श सिंह बख्शी उर्फ बख्शी और गोरखपुर के बाहुबली हरिशंकर तिवारी का संरक्षण मिला। पद्मसेठ की मदद से राम गोपाल कसमंडा ब्लॉक का प्रमुख, सीतापुर का जिला पंचायत अध्यक्ष और कांग्रेस से विधान परिषद का भी सदस्य बना।
बेबस मां ने कराया समझौता
पॉलिटिकली पॉवरफुल होने के बाद दोनों के बीच की खूनी रंजिश और तेज हो चली। गैंगवार में आए दिन 'अपनों' की लाशें गिर रही थीं। ऐसे में अन्ना की मां ने दूर के रिश्तेदारों की मदद से राम गोपाल से संपर्क साधा। अन्ना की मां को राम गोपाल मौसी कहता था। मुलाकात के दौरान अन्ना की मां ने रामगोपाल से कहा, 'बेटा, अब शांत हो जाओ, मैं अपने जीते जी अन्ना की शादी तो करा दूं।'
राम गोपाल का जवाब था, 'मौसी, आपने कहा है, तो अब अग्गी हमारी तरफ से नहीं होगी। मतलब अन्ना कुछ नहीं करेगा, तो मैं भी कुछ न करूंगा।
मां ने अन्ना से भी वचन ले लिया...अन्ना की मां की पहल पर हुई सुलह के बाद राम गोपाल ने डालीगंज छोड़ दिया। उसने अपना दायरा चारबाग और सीतापुर तक सीमित कर लिया, जबकि अन्ना ने खुद को डालीगंज के साथ उन्नाव में समेट लिया। लेकिन सुलह के बाद 1988 में अन्ना पर डालीगंज में जानलेवा हमला हुआ। हमला बबलू श्रीवास्तव ने अपने साथी के साथ किया था। हमले में अन्ना तो बच गया, लेकिन ड्राइवर मारा गया। वजह, बबलू को सूचना थी कि जिप्सी खुद अन्ना चला रहा है। इसलिए उसने कार्बाइन से फायरिंग ड्राइवर सीट पर की। बाइक से भागते समय हुई जवाबी फायरिंग में बबलू की कार्बाइन भी मौके पर गिर गई। उसका साथी भी मारा गया। इस मामले में बबलू के साथ रामगोपाल भी नामजद हुआ। हालांकि कहा यह जाता है कि हमला बबलू ने किया। इसमें राम गोपाल को कोई हाथ नहीं था। बाद में अन्ना और रामगोपाल दोनों ने अपराध से किनारा कर लिया। अन्ना 1995 में हुए गेस्ट हाउस कांड का प्रमुख आरोपी था। वहीं गेस्ट हाउस कांड, जिसमें मायावती को जान से मारने की कोशिश हुई। लेकिन 2009 में मायावती ने उसी अन्ना को उन्नाव से लोकसभा से टिकट दिया। लेकिन वो जीत नहीं पाया। इसके बाद अन्ना 2014 और 2019 में भी उन्नाव से सपा की टिकट पर मैदान में उतरा। लेकिन बीजेपी के साक्षी महाराज से हार गया।
. कमलेश चौबे
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